चांपा में श्रीमद् भगवद् गीता सार – सुखद जीवन का आधार का चौथा दिन संपन्न

चांपा में श्रीमद् भगवद् गीता सार – सुखद जीवन का आधार का चौथा दिन संपन्न
कर्म, अकर्म और विकर्म की गुह्य गति को समझना आवश्यक – शशिप्रभा दीदी
आज घर-घर महाभारत है, इसलिए गीता ज्ञान की आवश्यकता सभी को है – शशिप्रभा दीदी

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ज्ञान श्रवण करती महिलाएं
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गीता का ज्ञान कहती  दीदी शशिप्रभा
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आरती करते राजेंद्र शर्मा (ज्योतिषाचार्य), लक्ष्मीचंद देवांगन


चांपा। चांपा में आयोजित श्रीमद् भगवद् गीता सार – सुखद जीवन का आधार कार्यक्रम के चौथे दिन ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी ने गहन आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। उन्होंने आत्मा के 84 जन्मों की यात्रा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि आत्मा अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुःख का भोग करती है।


दीदी जी ने बताया कि मनुष्य के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?”। इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने महाभारत की कथा के माध्यम से दिया। उन्होंने बताया कि जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे, तब उन्होंने भगवान से प्रश्न किया कि इस जन्म में पाप न करने के बावजूद उन्हें यह कष्ट क्यों मिला। भगवान ने कर्मों की गुह्य गति को समझाते हुए बताया कि उनके पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म अधिक थे, इसलिए दंड देर से मिला। इसी प्रकार कई बार कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर भोगना पड़ता है।


शशिप्रभा दीदी ने कहा कि कर्मों के फल से कोई नहीं बच सकता। अच्छे कर्मों का फल सदैव अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा ही होता है, इसलिए मनुष्य को सदैव पुण्य कर्म करने चाहिए।


उन्होंने हिंसा और अहिंसा पर भी विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज घर-घर महाभारत जैसी स्थिति है, इसलिए गीता ज्ञान की आवश्यकता हर व्यक्ति को है। उन्होंने कहा कि जीवों को अपने स्वार्थ के लिए मारकर खाना बहुत बड़ी हिंसा है। जो जीव बोल नहीं सकता, उसके भीतर भी चेतना होती है और उसे भी उतना ही दर्द होता है। साथ ही मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देना भी अहिंसा का ही स्वरूप है।


दीदी जी ने कर्म, अकर्म और विकर्म की गहन व्याख्या करते हुए बताया कि सतयुग में किए गए कर्म ‘कर्म’ कहलाते हैं, क्योंकि वे प्रारब्ध के अंतर्गत होते हैं। वहीं द्वापर युग से देहभान और विकारों के वशीभूत होकर किए गए कर्मविकर्म’ या पापकर्म कहलाते हैं।


कार्यक्रम के यजमान स्वरूप श्री लक्ष्मीचंद देवांगन एवं श्रीमती उमा देवांगन ने श्रद्धालुओं का अभिनंदन करते हुए आगामी दिनों में कथा श्रवण हेतु अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होने का आह्वान किया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि  आशुतोष गोस्वामी, श्री राजेंद्र शर्मा (ज्योतिषाचार्य, जांजगीर),  मोहन यादव,  बुटू देवांगन सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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