रेत कार्रवाई में सवालों के घेरे में सरगांव तहसील, बाबुओं को गाड़ी रोकने का अधिकार देने पर उठे प्रश्न


रेत कार्रवाई में सवालों के घेरे में सरगांव तहसील, बाबुओं को गाड़ी रोकने का अधिकार देने पर उठे प्रश्न
सरगांव। अवैध रेत परिवहन पर कार्रवाई के दौरान सरगांव तहसील में एक बार फिर प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े हो गए हैं। रेत पकड़ने गए बाबुओं के पीछे से पहुंचे नायब तहसीलदार अभिषेक यादव द्वारा की गई कार्रवाई को लेकर अब विवाद गहराता नजर आ रहा है।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब कार्रवाई को लेकर सवाल पूछे गए तो नायब तहसीलदार का रवैया अचानक आक्रामक हो गया। बताया जा रहा है कि पूछताछ के दौरान उनका “ईगो हर्ट” हो गया और इसके बाद तत्काल कार्रवाई कर दी गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि “बड़े साहब” नाराज हुए तो कार्रवाई होना तय थी, भले ही नियमों का पालन हुआ हो या नहीं।
इस पूरे मामले में नायब तहसीलदार अभिषेक यादव का कहना है कि जो दो स्टाफ गाड़ी रोकने गए थे, उन्हें उन्होंने ही निर्देश दिया था कि जाकर वाहन को रोका जाए। लेकिन यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी भी बाबू या स्टाफ को बिना तय सरकारी मानकों के गाड़ी रोकने का अधिकार दिया जा सकता है?
नियमों के अनुसार, वाहनों को रोकने और जांच करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और अधिकृत अधिकारी तय हैं। इसके बावजूद यदि बाबुओं के माध्यम से गाड़ियां रुकवाई जा रही हैं, तो यह व्यवस्था और नियमों की अनदेखी मानी जा सकती है। आरोप है कि सरगांव तहसील में नायब तहसीलदार द्वारा अपने अलग नियम चलाए जा रहे हैं, जो शासन की मंशा और प्रशासनिक व्यवस्था के विपरीत है।
वही सब से बड़ा सवाल यह भी है कि यह और भी बड़े साहब कार्यालय में उपस्थित है जिसे तहसीलदार कहते है । और वे इस सब से अनजान होने की बात कहते नजर आए।
अब बड़ा प्रश्न यह है कि यदि अधिकारी अपनी मनमर्जी से काम करेंगे और तय प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया जाएगा, तो शासन-प्रशासन की व्यवस्था कैसे सुचारु और सुदृढ़ रूप से चल पाएगी। मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।




