जांजगीर-चांपा: दस वर्षों में होली पर सबसे कमजोर पुलिसिंग, सोशल मीडिया की सक्रियता और जमीनी हकीकत में दिखा अंतर

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हुड़दंगियों ने जलाई दुकान
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जगह जगह होता रहा उत्पात
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नियमों की धज्जियां उड़ाते नाबालिक
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अज्ञात उत्पतियों के द्वारा टेंट की गाड़ी एवं बांस बल्ली

जांजगीर-चांपा: दस वर्षों में होली पर सबसे कमजोर पुलिसिंग, सोशल मीडिया की सक्रियता और जमीनी हकीकत में दिखा अंतर

जांजगीर-चांपा। जिले में इस वर्ष होली के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले कुछ समय से जांजगीर-चांपा पुलिस सोशल मीडिया पर सक्रियता, “नए प्रयोग” और त्वरित कार्रवाई की तस्वीरों के जरिए अपनी उपलब्धियों का लगातार प्रचार करती रही है, लेकिन होली के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने इन दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया।

अगर स्थिति को ईमानदारी से देखा जाए तो बीते लगभग दस वर्षों में शायद ही कभी होली के दौरान इतनी कमजोर पुलिसिंग दिखाई दी हो। कई स्थानों पर उपद्रवियों का ऐसा दुस्साहस सामने आया मानो उनके मन में पुलिस का कोई भय ही न रह गया हो। होली के नाम पर कई जगह हुड़दंग, झड़प और रास्ता रोकने जैसी घटनाएं हुईं, जिनकी चर्चा ग्रामीण क्षेत्रों में भी होती रही।

इस स्थिति की सबसे बड़ी मिसाल थाना नवागढ़ क्षेत्र में देखने को मिली। देर रात पेट्रोलिंग कर रही पुलिस टीम पर ही कुछ उपद्रवियों ने पत्थरबाजी कर दी और शासकीय वाहनों के शीशे तोड़ दिए। बाद में पुलिस ने पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेजने की जानकारी मीडिया को जारी की। हालांकि जब हालात इस स्तर तक पहुंच जाएं कि पुलिस की गाड़ी ही उपद्रवियों के निशाने पर आ जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उपद्रवियों के मन से कानून का डर क्यों खत्म होता जा रहा है।

बताया जा रहा है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। जिले के कई ग्रामीण इलाकों में होली के दौरान हुई छोटी-बड़ी घटनाएं लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई हैं। अलग-अलग गांवों से सामने आई घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि त्योहार के दौरान अराजक तत्व किस तरह सक्रिय रहे।

इसी बीच एक और सवाल भी लगातार उठ रहा है। कुछ लोगों ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर बताया कि होली के दिन और उससे पहले हुई कई झड़पों या मारपीट की घटनाओं में पुलिस ने तत्काल एफआईआर दर्ज करने के बजाय लिखित शिकायत लेकर मामलों को सार्वजनिक न करने का आग्रह किया। यदि यह बात सही है, तो यह स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करती है कि कहीं कागजों पर अपराध के आंकड़े कम दिखाने की कोशिश तो नहीं की जा रही।

क्योंकि यदि घटनाएं दर्ज ही नहीं होंगी, तो आंकड़ों में कानून-व्यवस्था स्वतः बेहतर नजर आने लगेगी। ऐसे में यह सवाल उठना भी लाजिमी है कि क्या यह आंकड़ों की एक तरह की “जादूगरी” नहीं है, जिसमें वास्तविकता और आधिकारिक रिकॉर्ड के बीच दूरी बना दी जाती है।

एक फिल्म का संवाद भी इन हालात पर सटीक बैठता है—
“इस ओवर में गिरे विकेट, पिछले ओवर के झटकों का असर होते हैं।”

जांजगीर-चांपा में होली के दौरान जो हालात दिखाई दिए, उन्हें भी कई लोग इसी नजर से देख रहे हैं। यदि पिछले एक वर्ष की पुलिसिंग उपद्रवियों के मन में कानून का भय पैदा नहीं कर पाई, तो त्योहारों के दौरान उसका असर सामने आना स्वाभाविक है।

कुल मिलाकर इस बार होली के दौरान सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली पुलिसिंग और जमीन पर महसूस होने वाली पुलिसिंग के बीच का अंतर साफ नजर आया। और जब व्यवस्था अपने ही प्रचार से संतुष्ट हो जाए, तो उसके परिणाम अक्सर देर-सबेर इसी तरह सामने आते हैं।

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