प्रधानमंत्री के “सबका साथ–सबका विकास” को ठेंगा दिखाता चांपा का प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड

प्रधानमंत्री के “सबका साथ–सबका विकास” को ठेंगा दिखाता चांपा का प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड
चांपा।
देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जहां सबका साथ, सबका विकास की बात करते हैं, वहीं जांजगीर-चांपा जिले के चांपा स्थित कोटाडबरी क्षेत्र में स्थापित प्रकाश इंडस्ट्रीज लिमिटेड (पीआईएल) इस नारे को खुली चुनौती देता नजर आ रहा है। यह प्लांट विकास का प्रतीक बनने के बजाय अब क्षेत्र के लिए विनाश का कारण बन चुका है।
कहते हैं कि किसी भी क्षेत्र में उद्योग स्थापित होने से वहां रोजगार बढ़ता है, व्यापार फलता-फूलता है और विकास की गंगा बहती है। लेकिन पीआईएल प्लांट के आसपास का हाल देखेंगे तो विकास नहीं, बल्कि बर्बादी की तस्वीर साफ नजर आती है। प्लांट स्थापना के समय आसपास के लोगों ने भविष्य के सुनहरे सपनों के साथ महंगे दामों में जमीनें खरीदी थीं, ताकि व्यापार और आमदनी के नए रास्ते खुल सकें। लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी न तो जमीनों की कीमत बढ़ी और न ही कोई विकास हो पाया।
स्थिति यह है कि आज यहां व्यापार करना तो दूर, आम लोगों का गुजरना भी जोखिम भरा हो गया है। प्लांट से उड़ती जहरीली धूल और धुआं राहगीरों को गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सांस लेना मुश्किल हो गया है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं।
प्लांट के आसपास रहने वाले लोग गंदगी और प्रदूषण के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। रातों-रात घरों में पीआईएल प्लांट से उड़ने वाली डस्ट की मोटी परत जम जाती है। वहीं, प्लांट से निकलने वाला जहरीला धुआं पूरे वातावरण को जहरीला बना रहा है, जिसे आम नागरिक मजबूरी में सांस के साथ अंदर लेने को विवश हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि प्लांट के सामने और आसपास की जमीनों में आज तक कोई ठोस विकास नहीं हुआ। सड़क, नाली, साफ-सफाई और बुनियादी सुविधाओं का अभाव इस बात का प्रमाण है कि यह उद्योग क्षेत्र के विकास के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपने मुनाफे के लिए चल रहा है।
इस पूरे मामले में जनता और जनप्रतिनिधियों द्वारा कई बार आंदोलन का बिगुल भी फूंका गया, लेकिन हर बार या तो प्रशासन के बल का इस्तेमाल कर आंदोलनकारियों पर लाठियां बरसाई गईं, या फिर आंदोलन की आवाज को किसी न किसी माध्यम से दबा दिया गया। आरोप यह भी हैं कि कई बार आंदोलन करने वालों को “मैनेज” कर मामला शांत करा दिया गया।
यही वजह है कि आज पीआईएल प्लांट प्रबंधन की मनमानी चरम पर है और उसके आगे न प्रशासन बोलता दिख रहा है, न नियम-कानून। सवाल यह है कि क्या यही सबका साथ–सबका विकास है? या फिर विकास के नाम पर कुछ चुनिंदा उद्योगों को खुली छूट देकर आम जनता की सेहत और भविष्य से समझौता किया जा रहा है?
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर कब तक खामोश रहते हैं, या फिर जनता की आवाज को मजबूती से उठाकर पीआईएल प्लांट की मनमानी पर लगाम लगाई जाएगी।

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