
“हसदेव चीख रही है, माफिया लूट रहे हैं” — बरबसपुर घाट बना लूट का अड्डा
जांजगीर-चांपा।
कभी जीवन देने वाली हसदेव नदी आज कराह रही है… और उसकी इस कराह को दबाने में लगे हैं रेत माफिया, रसूखदार चेहरे और सिस्टम की खामोशी। सवाल सीधा है—क्या नदी बची रहेगी या सिर्फ फाइलों में “संरक्षण” लिखकर खानापूर्ति होती रहेगी?
बरबसपुर घाट की हकीकत किसी से छुपी नहीं है। दिन हो या रात, यहां खुलेआम नदी का सीना मशीनों से चीरकर रेत निकाली जा रही है। नियम कहता है—मैनुअल खनन… लेकिन यहां पोकलेन और जेसीबी ऐसे दौड़ रही हैं जैसे सरकार ने खुद ठेका दे रखा हो “लूटो जितना लूट सकते हो”।
गर्मी का मौसम आते ही माफिया का “सीजन” शुरू हो जाता है। नदी सूखती है और माफिया की जेब भरती है। सैकड़ों ट्रैक्टर-हाईवा रेत ढो रहे हैं, बड़े-बड़े डंप बनाकर भविष्य की कालाबाजारी का इंतजाम किया जा रहा है। और प्रशासन?
वह कभी-कभी औपचारिक कार्रवाई कर फोटो खिंचवाने में व्यस्त है।
स्थानीय लोग खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि पूरा “सिंडिकेट राज” है—जिसमें छोटे दलाल से लेकर बड़े रसूखदार तक शामिल हैं। कुछ लोग तो खुलेआम सत्ता से नजदीकी का दम भरते हुए कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वैध घाट की आड़ में अवैध खेल चल रहा है। नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन कार्रवाई “चुनिंदा” हो रही है। छोटी मछलियां पकड़ी जा रही हैं, मगर बड़े मगरमच्छ अब भी आजाद घूम रहे हैं।
लोग सवाल पूछ रहे हैं—
अगर कोई ईमानदार अधिकारी यहां कार्रवाई करने पहुंचेगा, तो क्या उसका तबादला करवा दिया जाएगा?
क्या यही कारण है कि बरबसपुर घाट पर आज तक बड़ी कार्रवाई नहीं हो पाई?
हसदेव नदी अब मानो खुद पुकार रही है—
“मुझे माफियाओं से बचा लो… वरना आने वाली पीढ़ियां सिर्फ सूखी रेत देखेंगी, नदी नहीं।”
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस खुली लूट पर कब तक आंखें मूंदे रहेगा…
या फिर सच में कोई बड़ा एक्शन लेकर इस “रेत के साम्राज्य” को ध्वस्त करेगा।
क्योंकि अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई… तो यह सिर्फ अवैध खनन नहीं, बल्कि एक पूरी नदी की हत्या मानी जाएगी।




